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Monday, 18 January 2021

खिलौने वाली दादी माँ

Kishor Ranjan

 


--------खिलौने वाली दादी माँ की विवशता--------


सुबह-सुबह भ्रमण करते हुए, गाँव के दूसरे छोर पर स्थित बरगद के बगल में रघु को खिलौने वाली दादी माँ मिली। वही दादी माँ जो बचपन में तरह-तरह के खिलौने रंगीन डलिया में साज कर बेचने रघु के गाँव आया करती थीं। रघु का उनसे रिश्ता बहुत पुराना था।


बात उस समय की थी जब रघु गाँव में मास्टरजी के पास  स सैया निन्यानबे.... अंठानबे... संतानबे....छियानबे.... पचानबे....,  पढा करता था।

     शरारती रघु एकदिन विद्यालय से वापस लौट रहा था। गाँव के ऊपर टोला में स्थित दुबे बाबा मंदिर के पास बरगद के नीचे खिलौने वाली दादी माँ खिलौने बेच के वापस लौटते समय विश्राम कर रही थी। दादी माँ जब उसको देखी तो बोली बिटवा बड़ी जोर के पानी पियास लागल हो तनी पानी के बेबस्था होतो बीटा? "हम तोर नौकर हैं का!", बड़बड़ाते हुए रघु बोला। शरारती रघु हँसते- गाते बस्ता हवा में लहराते हुए जाने लगा। कुछ दूर जाने के बाद पीछे मुड़कर देखा, दादी माँ भी जाते रघु को आशा भरी नजरों से देख रही थी ! रघु घर जाके सबसे पहले बस्ता धान के खोंचर(पुवाल का बनाया गया अन्न भण्डारण के लिए) पर रखा और एक लीटर वाला सफेद डब्बा में पानी भरा साइकिल के करियर में बांध कर के बीच मे घुसकर चलाते हुए जाने लगा। जाकर दादी माँ को डब्बा दिया और बोला ये लो पियो पानी। दादी माँ रघु की ओर देखते हुए हाथ को निचले होंठ के नीचे लगाई, पूरा डब्बा गटक गई। रघु डब्बा लेकर जाने ही वाला था कि दादी माँ डलिया से बचे-खुचे मिट्टी के खिलौने रघु को देते हुए बोली जुग-जुग जियो बिटवा! रघु भी खिलौने लेते हुए दादीमाँ की ओर देखता रहा। घर लौटते समय रघु बार - बार साइकिल रोक के पीछे मुड़ के देखता गया। घर आने पर उसके मस्तिष्क में बार-बार वो दृश्य आ रहा था। दादी और रघु के मौन संवाद ने शरारती रघु का मन विचलित कर दिया था। वह शायद समझ चुका था कि भर टीपा पानी से सिर्फ प्यास ही नहीं अपितु अपनापन तलाशने की प्यास भी मिट जाती है।


उसके बाद से जब भी दादी माँ, रघु के गाँव आती वह खिलौना देने नहीं भूलतीं। रघु भी दादी माँ के पास बैठ कर गप्पे मार लिया करता था और जाते समय दादी के ना ना करने पर भी रघु दो पाव अनाज उनकी झोली में डाल दिया करता था। दादी माँ रघु के लिए जितने प्यार से स्पेशल खिलौना बना के लाती थी उसका मूल्य रघु भी अपने मुस्कुराहटों से चुका दिया करता था।


वक्त बीतता गया। रघु अपने सपनों को पूरा करने के लिए शहर गया। शहर के भागदौड़ भरी जिन्दगीं ने उसे बहुत थका दिया है। आज शहर से थका-हारा वह कुछ दिन विश्राम करने गाँव आया है।


सुबह भ्रमण करते हुए उसे खिलौने वाली दादी दिखाई पड़ी। उसने देखते ही दादी को पहचान लिया और बोला कि हाल-चाल दादी माँ? हाथ से आंख पर छाया बनाते हुए दादी बोलीं "ठीके हो बिटवा तोरा नैय चीन्हे पारलियो बेटा"। "दादी मेरा खिलौना नहीं लाये आप!"रघु मुसकुराते हुए बोला।" रघुवा रे! क्षण भर के लिए उनके चेहरे पर मुस्कान थिरकी। किंतु मुस्कान की ओट में पल रही पीड़ा दादी माँ से छुप नहीं पाई। "कहाँ चल गेल हेली बेटा देखावे नए हेलीं, अब बुढ़िया हो गेल हियो बेटा अँखियाँ ने मालूम दिए हो खिलौना नैय बनावेल पारे हियो" बुझे स्वर में बोली। 


आप ज्यादातर लोगों से उनका हाल-चाल पूछेंगे। सर्वप्रथम बोलेंगे "सब ठीक है"। बाद में एक दुखभरी कहानी बताएंगे। इससे पता चलता है सकारात्मकता और सहनशीलता हमारे लोगों में भरी पड़ी है। भले ही वो सकारात्मकता अपने को छोड़कर किसी और के काम आवे।


चेहरे पर चिर उदासी लिए दादीमाँ एक-एक करके सारी कहानी कहती गई। बता रही थी उनके पास पैसा नहीं है इलाज कराने का हाथ पैर के जोड़ों में दर्द करता है। हाथ का अंगूठा दिखाते हुए दादीमाँ बोली, "बेटा सब मेटी गेलो बुढ़वा अंगुलिया के निशान मिशिनियाँ में नैय लिए हो बिरधा पेंसिल नए दिए लागलो छोटका बैंकवा(CSP) में। हाथ गोड़ दर्द करे हो पैसा कोड़ी न हो ईलाज के।" काम करते-करते  उनके उँगली का निशान मिट गई थी, बॉयोमेट्रिक में दिक्कत आ रही थी। जिससे उनका पैसा निकल नहीं पा रहा था, बॉयोमेट्रिक पद्धति द्वारा। रघु ने उन्हें बड़ा वाला बैंक जाने का सलाह दिया जहाँ से वो किसी से फॉर्म भरवा कर आसानी से पैसा निकाल सकती हैं।


चार बेटों की माँ, जब अपने बेटों को पाल पोसकर बड़ा कर रहीं होंगी। तब शायद ये नहीं सोची होंगी की उन्हीं के वजह से आज उसे दर दर ठोकरें खाते हुए भटकना होगा। सोलह बरस पहले जब उनके पति का देहांत गंभीर बीमारी से जूझते हुए हुवा था। उसके बाद दादी माँ को उसके बेटों ने पंचायत के फैसले पर तीन माह के रोटेशन पर बारी-बारी चारो बेटों को साल में एक-एक बार रखने पर सहमति हुई। एक माँ जीते जी अब चार भागों में बांटी जा चुकी थी! इससे ज्यादा कष्टकारी समय और क्या हो सकता है एक औरत के लिए!


एक बूढ़ी औरत कितना खा सकती हैं? कितने रुपए खर्च कर सकती हैं अपने गुजारा के लिए? क्या यही दिन देखने के लिए उसने अपने बच्चों को पाल-पोषकर बड़ा की थीं? इन सारे प्रश्नों का उत्तर को उसके बेटों के ओछी सोच ने धुंधला कर रखा है। 


न जाने आज भी कितनी दादी माँ को अपनों से मिले दुत्कार ने इतना विवश बना होगा कि हर आती-जाती निगाहों में अपनापन ढूंढने की कोशिश करती होंगी। और ईश्वर से प्रार्थना करती होंगी "है ईश्वर मुझे बुला लो अपने पास अब और नहीं!" फिर याद आती होगी उसके लाडले नालायक बेटे फिर थोड़ा और दिन जीने की आश लिए दुबारा भटकती होंगी सड़कों पर।

हाय रे मोह!


                 ----- किशोर रंजन


Friday, 18 December 2020

दादा जी का बींड़ी वाला बटुवा....

Kishor Ranjan

 


-----------दादा जी का बींड़ी वाला बटुवा----------


सुबह होते ही एक लौटा पानी लेके प्रधान जी के खेत में पेट संबंधित समस्याओं को हल करने के बाद, रघु के दादाजी गाँव में अपने चहेते हमउम्र सुधीजनों को बीड़ी पीने का न्योता दे आते थे।


बीड़ी भारतीय सिगरेट है। यह तेन्दु( वानस्पतिक नाम: Diospyros melanoxylon) के पत्तों में तम्बाकू लपेटकर धागे बांधकर बनाई जाती है। भारत के ग्रामीण और शहरी स्थानों में इसे मजदूर और किसान वर्ग अधिक प्रयोग करता है। भारतीयों मे यह बहुत ही कम कष्ट मे निर्माण होने वाली स्वदेशी सिगरेट है। बिडी सेहत, स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है। और इसके तंबाकू के कारण धूम्रपान से फ़ेफ़डों के तथा मुंह के कैंसर जैसे जानलेवा रोग हो जाते हैं।


घर के मुख्य दरवाजे के बायीं ओर एक छोटा सा कमरा था, जहाँ हर शाम को एक सभा होती थी। जिसमें दादाजी के चहेते लोग बैठते थे। बीड़ी सुलगाया जाता था। और खुब गप्पेबाजी होती थी। रघु भी बगल वाला कमरे में ढिबरी जला के पढ़ने बइठ जाता था। उधर बीड़ी का धुआँ कमरे के बाहर लपेटे मारकर आसमान की और रुख कर रही होती थी। इधर रघु के किताब वाला सिद्धार्थ का हंस बाहर निकलकर उसके बगल वाला लौटा के पानी में तैरने लगता था और रघु को निंद्रा मईया अपने आँचल में बुलाने लगती थी।


कुछ बरस पहले की बात है दादाजी, अधजला बीड़ी खलिहान में फेंक दिए थे जिससे आग लग गई थी। रघुवा, मुंशी काका के कुआँ में लगे लाठ-कुंड़ से पानी निकाल-निकालकर बुझाया था, आग बुझाते-बुझाते दस बीड़ा धान जल गया था। और सुबह सभी लोग दादाजी का मजाक उड़ा रहे थे। कह रहे थे-  "बीड़ी पीने नहीं आता है घर का संभालिएगा।"


एकबार की बात है बीड़ी का महफ़िल अपने चरम सीमा पर थी, धुँवाधार माहौल था। लटोरी काका बीच में बोल दिए-" बीड़ी से दिमाग एकदम एक्टीभेट हो जाहे मरदे।"  ई बात बगल वाला रूम में बईठल रघुवा के कान में गया। उसके मस्तिष्क के हाइपोथेलेमस में भी दिमाग एक्टीभेट करने का अरमान जाग गया।

           अगले ही दिन शाम को पाँच बजे के करीब दादाजी, खलिहान से बीड़ी पीते हुए लौट रहे थे। रघुवा इंतजार कर रहा था। रात अमावस वाली काली थी। आते हुए सड़क में सिर्फ दादाजी का बीड़ी  दूर से मंगल ग्रह की तरह लाल नजर आ रहा था। घर के नजदीक आते ही दादाजी ने, बीड़ी का आधा पिया हुवा हिस्सा फेंफ दिया। फिर क्या था! फटाक से रघुवा उठा लिया बीड़ी और छुप गया किबाड़ के पीछे। इस तरह गायब होता हुआ बीड़ी, दादाजी को संशय में डाल गया! धांय से तीन सेलवा टॉर्च बार के लगे खोजने, देखे केबाड़ के पीछे रघुवा मुँ में बीड़ी लेके दो-चार सुट्टा ले चुका था। फिर क्या था!  दादाजी का साठ साल पूराना हाथ उसके गाल पर ऐसे बरसा की बीड़ी लगभग दस हाथ दूर बिगा गया, रघुवा का दिमाग एक्टीभेट करने वाला अरमान किसी सरकारी पुलिया की तरह टूट गया था।


दादाजी के गुजरे बरसों बीत गए। आज भी रघुवा जब प्रेक्टिस सेट में "विश्व धूम्रपान निषेध दिवस" को ऑप्शन नम्बर C पर टंकित "31 मई" को टिक कर रहा होता है तो उसे याद आती है दादाजी के जोरदार थप्पड़ में छुपा हुआ प्यार। याद आती है घर के दक्षिण साइड बड़का हौज के ऊप्पर वाला खूंटी पर टंगा हुआ दादाजी का "बीड़ी वाला बटुवा"।



नोट:- धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।


            -------किशोर रंजन




Sunday, 29 November 2020

मिस यू भंडारा:- बाई एक विद्यार्थी

Kishor Ranjan


 ------भंडारे और विद्यार्थियों का कॉम्बिनेशन-----



दिनेशवा, कैलू दा के दरवाजे को खटखटाते हुए अंदर आए, देखे कैलू दा, हाथ में लुसेंट लेके टेंशनीयाए हुवे हैं। 

    "का हुवा कैलू दा, काहे टेंशन में हैं? का हुवा जी?", दिनेश पूछा।

              का बताएं महाराज! केतना दिन खाएँ - दाल, भात और चौखा? बीच मे टोकते हुए दिनेश बोला, का हुवा जी बोलिए तो।

       कैलू दा, बोले आप ही बताईए दस बाई आठ के रूम में कितना अकेला रहेगा आदमी! ऊपर से रोज एके चीज खाना, मुँ का फ्लेवर भी बदलना जरूरी है न जी। साल बीतने पर है, एक्को बियाह के भंडारे में घुस के खाए नहीं हैं। ई करौना तो हम विद्यार्थी जमात को भीरा के लपेटा है। कम-से-कम सप्ताह में एक दिन तो मुँह का फ्लेवर बदलता था न जी। ई ससुरा करौना में किधर जाए आदमी। देखिए ई लिफाफा, अलमारी से इतने सावधनी पूवर्क लिफाफा निकाला "जैसे कोई वैज्ञानिक स्पेस शिप ग्रह पर उतारता हो।" लिफाफा दिखाते हुए बोला, जब - जब लिफाफा को निकालकर देखते हैं, बियाह का भंडारा बहुत याद आती है, सौ बरस जिए उन सारे भंडारे का आयोजककर्ता, जिसमें हम घुस के खाए हैं।


एक लिफाफा कैलू दा, सन 2014 में खरीदे थे। लिफाफे के ऊपरी छोर से ठीक दो सेंटीमीटर नीचे एक रुपइया का सिक्का सटा हुआ था। उसमें सौ का नम्बरी डाल के उसे कमीज के ऊपर वाली थैली में इस तरह से सजा के कैलू दा, विवाह भवन घुसते थे की उस लिफाफे का एक रुपया वाला पोर्शन दूर से चमकता हुआ सितारा लगता था। भंडारे से निकलते समय तक वो लिफाफा, अमोनियम क्लोराइड की तरह ठोस से सीधे गैस में परिवर्तन होके गयाब हो जाता था। प्रकाश की चाल से थोड़ा कम वेग से ऊपर वाले जेब से नीचे वाले जेब में शिफ्ट हो जाता था। इस प्रकार लिफाफे की उम्र लम्बी होती गईं। उस लिफाफे को संग्रहालय में रखवाया जा सकता है!


अभी पिछले साल ही शीतला बियाह भवन में कैलू दा ने इतना शानदार नागिन डांस किया था कि लड़के के फूफा ने दस गो दस टकिया, धुरा की तरह उनके ऊपर छिट दिए थे। और लड़के के जीजा ने सिगरेट का पैकेट दिया था, जिसको बाद में कैलू दा ने गनपतिया को बेच दिया था। नागिन डांस करते समय उनका लिफाफा खो गया था, जो बाद में दिनेशवा लाकर दिया था। दिनेशवा दस टकिया चुनते समय कैलू दा का लिफाफा कैसियो वाले का कुरसी के नीचे पाया था। बाद में दू पीस करूवा रसगुल्ला मांगते समय वेटर ने पहचान लिया था और मुस्कुराते हुए एक पीस एक्स्ट्रा दे दिया था।


बड़े  उदास भरे स्वर में कैलू दा बोले देखो दिनेश ई मुहास्क और सेन्टीनाइजर, भंडारा खाने के लिए ही लीये थे हम। अभी कुछ दिन पहले ही एक भंडारे में घुसने का नाकामयाब कोशिश किए थे। दरबान बाहरे से लौटा दिया, बोला पचास आदमी हो चुका है अंदर। आप कौन हैं!!! बड़ी खराप लगा, शतक मार दिए हैं! ससुरा इतना डरावना सवाल पूछने की कलतक किसी में हिम्मत न हुई थी।

             इधर इंतजार में बैठे हैं, कब सरकार का मैनेजमेंट सिस्टम बियाह में पचास का नौटंकी खत्म करके अनलिमिटेड करेगा। लेकिन अब तो पचास से 100 हो गया। देखता हूँ, तो लगता है ससुर पुलिस का नम्बर है।

            इतनी दर्द भरी दास्तान सुन के दिनेश भी बगल में स्पीडी लेके बैठ गया। कुछ देर बाद बोला- पचास रुपइया दीजिये कैलू दा मिला के सांझ को मुर्गा लाएंगे।




            ------------ किशोर रंजन-----------




Thursday, 26 November 2020

गाँव के चौराहे पर अंगीठी(बोरसी) कार्यक्रम....

Kishor Ranjan

 




--------गाँव के चौराहे का बोरसी कार्यक्रम--------


भोर होने के इंतजार में लटोरी काका चार बार बीड़ी पी चुके थे। "ससुरा ठंढी में पेशाब बड़ी लागे है महाराज" बड़बड़ाते हुए, भजन में डूब गए। उन्हें  नींद कम आती है आजकल, उम्र ढलने के साथ-साथ मेलाटोनिन हार्मोन का रिसाव कम होने लगता है, जिससे नींद कम आने लगती है। एक नींद लेके पलक खुली बिछौना समेटे और ढाको से निकले चल दिए चौराहे पर बोरसी सुलगाने।

ढाको और बोरसी का गजब कॉम्बिनेशन है। खलिहान में फसल की रखवाली के लिए वहाँ एक नरूवा और बांस का छोटा घर बनाया जाता है, उसे ही कहा जाता है ढाको। ठंढी में ढाको में सुतने का एक अलग ही आनंद है आपको वो आनंद, शायद ही रूम हीटर दे पाए। कहीं चौराहे या घर में गड्ढा खान के या कोई बरतन में लकड़ी और घास-फूंस में आग लगा के ठंढी से बचने के लिए तापते हैं, इसे ही बोरसी सिस्टम कहा जाता है। गौर से किसी चौराहे पर बोरसी सुलगते देखने पर ,प्रशांत महासागर का चौराहा (हवाई द्वीप) पर स्थित संसार के सबसे सक्रिय ज्वालामुखी 'किलुवा' की तरह प्रतीत होता है।

लटोरी के गाँव का चौराहा ऊपरी टोला में हैं, जिसके ठीक बगल से एक नदी बहती है। पूरे गाँव के लोग अपने पेट सम्बन्धित समस्या का हल करने इसी नदी तट के आस-पास आते हैं।
                                   "का रे लटोरिया भोरे-भोरे बोरसिया जोर दिए रे", कहते हुए डोमन काका बोरसी के समीप आके सर्व प्रथम हाथ सेंके फिर पीछे घूर के पिछवाड़े को बोरसी से ठीक पाँच इंची नजदीक लाए। कुछ देर तापने के बाद बोले, बड़ी ठंढी है रे लटोरी साला पूरा शरीर कोंकड़िया जाता है मरदे, ऊपर से ई नदी का पानी लगता है ससुर सीधे कश्मीर से आ रहा है। लटोरी काका बोले 'जाने हा.. डोमन दा ई बोरसी सिस्टम नए रहतले, हम गरीब सब त अइसने ठंढीए से मर जइतलई। सही कहा रे लटोरी, डोमन काका बोले।
                    इधर लटोरी काका का पाँचवा और सबसे छोटका लड़का दिनेशवा रोते-चिल्लाते हुए बक रहा था.." ससुरा हमरा टायर केकरो क्या बिगाड़ा था बे के उठा के ले गया। भोरे-भोरे उठ के चलाते थे रोड मा। असल में हुवा ये था कि औंस ज्यादा पड़ गया था,  लकड़ी भींगी हुई थी आग सुलग नहीं रही थी। तो लटोरी काका दिनेशवा का टायर सुलगा दिए थे।
कुछ देर में दिनेशवा बोरसी ज्वाइन किया तुरन्त समझ गया कि उसके टायर को बड़े बेहरमी से उसके बाप ने उच्च तापमान पर जला के ताप डाला है। फिर क्या था! उसका एड्रिनल ग्रंथि सक्रिय हो गया। लगा बाप को गरियाने। दो-चार थापड़ देके उसको वहाँ से बिदा किया उसके बाप ने। देखाअ ने डोमन दा सरवा पढ़े-लिखे ना हे आर दिनभर टायर चलावे हे बढियाँ करलिये ने डोमन दा जोर देलिये टायर के बोरसी में। एक नम्बर काम किए आप, ई ठंढी में सबसे पहिले अपन शरीर के रक्षा, बाद में कुछ और, डोमन काका बोले।
तबतक गाँव के सभी वरिष्ठ और सम्मानीय लोग बोरसी सिस्टम को ज्वाइन कर चुके थे। चर्चा का प्रमुख केंद्र था जियो बाइडन और ट्रंफ। आप बोरसी के आसपास में चर्चाओं को सुनेंगे तो नहीं लगेगा ग्रामीण इलाके पिछड़े हैं। यहाँ देश-दुनियाँ के विशेषज्ञ मिलेंगे आपको।

बोरसी अपने चरम सीमा पर धधक रही थी। दु-चार बच्चा-बुतरू उसमें नयका अलुवा और इमली पकने के लिए डाल चुके थे।
"राधे-राधे सभी सुधीजनों को", गाँव के मास्टर साहब बोले। सभी लोग एक साथ राधे-राधे कहते हुए मास्टर जी को जगह दिए बोरसी तापने के लिए।
मास्टर जी पूरे गाँव मे बड़े ही दुलारे और सम्मानीय रत्न हैं। उन्हें पूरे गाँव के लोग बड़ा इज्जत करते हैं।
कहाँ देरी कर देल्हो माटसाब, लटोरी बोले। 

बोरसी सिस्टम के पास बैठ के मास्टरजी, सभी लोगों को देश-दुनियाँ की खबरें बताते थे । मास्टरजी को लोग सुनने के लिए भी व्याकुल रहते हैं। आज मास्टर जी एक नया प्रसंग छेड़ दिए, बड़े गंभीर मुद्रा में लग रहे थे। मास्टर जी कह रहे थे.... लोग जो अलाव जलाते हैं उनमें लकड़ी का प्रयोग करते हैं तो प्रदूषण तो बढ़ता है लेकिन मात्रा कम होती है। टायर, ट्यूब और अन्य चीजें जो लोग जला देते हैं उससे उन्हें नहीं पता है ये सभी पूरी तरीके से जल नहीं पाते है और प्रदूषण की मात्रा को तेजी से बढ़ाते हैं।
"हमारे स्वास्थ्य पर प्रदूषण का गहरा असर पड़ता है। इससे अस्थमा और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) बढ़ता है, जिनमे क्रोनिक ब्रॉन्काइटिस और एम्फ्य्सेमा जैसे रोग शामिल हैं। प्रदूषित वायु के कारण होने वाले रोगों के सबसे आम उदाहरण अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, त्वचा रोग, सीओपीडी, आंखों में जलन जैसे श्वसन रोग हैं। इसके अलावा कई प्रकार की एलर्जी से भी लोग परेशान हो रहे हैं। वायु प्रदूषण से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।"

लोग बड़े ही गम्भीर मुद्रा में सुन रहे थे। सारा ज्ञान बाचने के बाद माटसाब बोले "अरे डोमन दुइ चेला अऊर देहिं मरदे अगिया बुतल जाहो"।
और सभी ठहाका लगा के बोरसी तापने लगे।

बोरसी को तापने का सुख अगर आपने कभी लिया हो, तो आपको पता होगा, ई सुख और कहीं नहीं है। जउन मजा बोरसी तापने में हैं औ कहीं नही है। भर ठंढी इसका मजा लेते रहिए। सावधानी बरतते हुए खूब बोरसी तापीए।

----------------------किशोर रंजन----------------

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Tuesday, 24 November 2020

गाँव और नेवान्न....

Kishor Ranjan

 




गाँव और नेवान्न...........


धान का कटाई हो चुकी है। धान, खलिहान में चढ़ चुका है। डेंगाने का काम जारी है। छपाक-छपाक की मधुर ध्वनि से लगातार कुटाई चल रहा है। चारो ओर धड़ाक-धड़ाक, घरघर और छपाक-छपाक ध्वनि जे वातावरण गुंजायमान है। भले ही पढ़े-लिखे लोगों के लिए पचासी डेसिबल से ऊपर का ध्वनि प्रदूषण है, पर यही ध्वनि देश की जीवनरेखा है।


इधर टिकेश्वर महतो उर्फ टिक्सरा , मध्यम तारत्व में गुनगुनाते हुए....


 पटना से पाजेब बलम जी, आरा से होठलाली......

            मंगईदा.... छपरा से चुनरिया छिटवाली....   


...गाते हुए...धान होंक रहा है। धान डेंगाने के बाद उसको खलिहान में पसारकर खंखड़ा और बचा हुआ नरूवा का टुकड़ा सूप से हवा देकर  निकालने का प्रक्रिया है, होंकाई। 

           टिक्सर बहुत गदगद है जैसे-जैसे नेवान का तारीख पास आते जाता है वैसे - वैसे उसके मुँह में भरत शर्मा का निर्गुण निकलने लगता है, ये संकेत उसके खुश होने का है। फसल घर लाने का खुशी, नया अन्न ग्रहण करने का खुशी।


जिस तरह भूमध्यसागर का प्रवेश द्वार है जिब्राल्टर स्ट्रीट है उसी प्रकार नया अन्न ग्रहण करने का प्रवेश द्वार है नेवान्न पर्व। हर वर्ष टिक्सर नेवान्न के लिए उत्साहित रहता है। धान के डेंगाई के बाद वह नया धान का चूड़ा कुटवाता है। चूड़ा घर लाने के बाद नाहा-धोकर विधिवत गाँव के काली मंदिर और तमाम देवता-पितरों के नाम पर अंगना में बने रंगोली(नया चावल और दूध को कूटकर बनाया मिश्रण) में स्थित हवन कुंड में अर्पण किया जाता है। उसके बाद सपरिवार आंगन में बैठकर। पत्तल में नया धान का चूड़ा, कुँढ़िया का साँची दही, पियोर गुड़, केला और एगो कटोरी में नया अलुवा, गोभी, टमाटर, बेगन और धनियाँ पत्ता वाला शानदार तरकारी(सब्जी) सपरिवार, सूर्यदेव तथा अन्नदेव् को प्रणाम करके कितने चाव से खाता है।


 रेस्टोरेंट के खाने में मिले मोनो सोडियम ग्लूटामेट(स्वाद बढ़ाने वाला रसायन) आपको वो स्वाद नहीं दे सकता जो टिक्सर अंगना में बैठ के तरकारी से लेता है। लाइसोजाइम, टायलिन, डाइस्टेज तथा म्युलिन की समझ नहीं रखने वाला टिक्सर खाना को इतने चाव से स्वाद लेके खाता है कि तमाम पाचक रस खुद ब खुद बाहर आने को आतुर रहता है पचाने के लिए, उसे इलियम( छोटी आँत का अंतिम भाग) तक खुशी से आने में कोई परेशानी नहीं होती।


आप डिजिटल रूपी वर्चुअल दुनियाँ में  खोजते रह जाएंगे, पर वो आत्मीयता और घनिष्ठा नहीं मिलेगी। गोगुल और उठुब भले ही आपको सभी जानकारी उपलब्ध करा दे पर अभी उसका सर्च इंजन इतना शक्तिशाली नहीं हुआ है कि बता दे टिकेश्वर अपने आंगन में बैठकर कटोरी के तरकारी को को किस स्वाद से चखता है, ये नहीं बता पाएगा। 


हो...... झुमरी तिलैया से... झोंपदार झुमका....

          झुलनी बनाइले रंग.. बाजे जिला दुमका....

        बीकानेरी बिंदिया चम-चम..बनारस से बाली...

       की मंगईदा छपरा से चुनरिया छिटवाली....

        

और गुनगुनाते हुए काम पर लग जाता है....

ये आत्मीयता और अल्हड़पन अब सिर्फ गाँव को ही नसीब है।


आपके यहाँ नेवान्न कब है?? या हो गया?? नीचे कमेंट में लिखिए........


------- किशोर रंजन

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